‘वंदे मातरम’ से छूट जाते थे अंग्रेजों के पसीने… संसद में 10 घंटे की बहस इस गीत के विवाद को खत्म कर सकेगी?
संसद में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा होगी। यह गीत सालों से विवादों में रहा है। कुछ मुस्लिम समुदाय इसे स्वीकार नहीं करते। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की ओर से लिखित यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बना।
नई दिल्ली: संसद में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ पर आज चर्चा होने वाली है। सरकार ने शीतकालीन सत्र के 10 कीमती संसदीय घंटे इस गीत पर बहस के लिए रखे हैं। सवाल यह है कि क्या हमारे माननीय सांसद इस खतरनाक बहस को हमेशा के लिए खत्म कर पाएंगे?
भारत में ‘वंदे मातरम’ को लेकर सालों से विवाद चल रहा है। कुछ मुस्लिम इसे राष्ट्रीय गीत के तौर पर स्वीकार नहीं करते। वे न सिर्फ पूरा गीत गाने से इनकार करते हैं, बल्कि ‘वंदे मातरम’ शब्द का इस्तेमाल करने से भी बचते हैं। इसकी वजह यह है कि गीत में मातृभूमि को देवी दुर्गा और लक्ष्मी के रूप में दर्शाया गया है। उनका तर्क है कि यह इस्लाम की उस मान्यता के खिलाफ है, जो किसी और की पूजा करने की इजाजत नहीं देता।
अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध घोष था ‘वंदे मातरम’
‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं है। इसे 1875 में बंगाली लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। बाद में उन्होंने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले हिंदू धार्मिक संप्रदायों ने इसे अपना युद्ध घोष बनाया। इसने उनके बौद्धिक और शारीरिक विद्रोह को जगाया। 1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया, तो यही गीत बंगाली एकता का आधार बना। जब भी अंग्रेज लोगों को चुप कराने की कोशिश करते, क्रांतिकारी ‘वंदे मातरम’ गाकर माहौल में जोश भर देते थे। उस समय ‘वंदे मातरम’ कोई हिंदू धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिरोध का एक नारा था। अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित करने की कोशिश की, लेकिन यह बढ़ते क्रांतिकारी जज्बे को कुचलने में नाकाम रहे।
कब और कहां से शुरू हुआ विवाद?
अंग्रेजों को 1909 में मुस्लिम लीग के नेता सैयद अली इमाम के एक बयान से उम्मीद की किरण दिखी। इमाम और उनके कुछ समर्थकों को यह गीत ‘काफिरों का गीत’ लगा और उन्होंने मुसलमानों को इससे दूर रहने को कहा। जो नारा बंगाल की एकता का प्रतीक था और राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था, वह अंग्रेजों की सांप्रदायिक साजिश का शिकार हो गया। कांग्रेस को एक राष्ट्रगान की जरूरत थी। उन्होंने एक समिति बनाई, जिसमें जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे दिग्गज शामिल थे। टैगोर की सिफारिश पर ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पैराग्राफ को राष्ट्रीय गीत के तौर पर चुना गया। इन पैराग्राफों में देश की भूमि, नदियों और बगीचों की प्रशंसा की गई थी। समिति ने बाकी पैराग्राफ छोड़ दिए थे, क्योंकि उनमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र था।
संवैधानिक अनिवार्यता से वंचित है ‘वंदे मातरम’
24 जनवरी 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा मिलना चाहिए। लेकिन इसे संवैधानिक दर्जा नहीं मिल पाया। संविधान के अनुच्छेद 51A के अनुसार, हर भारतीय के लिए राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ गाना अनिवार्य है। ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता मिली, लेकिन इसे गाने के लिए कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। हालांकि, तब से समय-समय पर इसे विवादों में घसीटा गया है। अगर हमें आगे बढ़ना है, तो हमें इन बनावटी विवादों पर लगाम लगाना सीखना होगा। लेकिन यह कैसे हासिल किया जा सकता है?